हमारा जीवन रिश्तों से भरा पड़ा है रिश्तें हर प्रकार से हमें प्रभावित करते हैं। कुछ लोग तो रिश्तों की मर्यादा ही भूल जाते हैं तब हमें लगने लगता हैं कि एक अजीब सा अनजानापन आ गया है हमारे जीवन में।
कुछ इन्हीं शब्दों को मैनें एक अलग लहजें में कहने का प्रयास किया है---
मैं चलता रहा, यूं ही चलता रहा
कुछ इन्हीं शब्दों को मैनें एक अलग लहजें में कहने का प्रयास किया है---
मैं चलता रहा, यूं ही चलता रहा
राहें अजनबी सी होती गई
कब राहें मुझसे अनजान हुई, मालूम नहीं
जब पता चला तब पता हुआ
कि राहें ही क्या, राहगीर भी हमसे अजनबी हो गए हैं
जिन्हें कभी मैं राहें बतलाता था
आज मैं खुद राहों के राज उनसे मालूम करता हूँ
कितना अजीब है ना अनजान हो जाना
ज्यादा अजीब तो है अपनों से अनजान होना
सोचता हूँ वक्त का दरिया तो बह ही गया है
क्यों न सीधा सागर में ही चलूं
सागर में झाँका तो सहम ही गया
दफ्न थी अपनों से नादानी,
बर्बाद वक्त की लहरें उठ रही थी
वक्त तो गुजार ही दिया था,
वक्त निकालने के लिए
तैरना नहीं सीखा,
तभी डूब ही गये दरिया में तो
अब तो सामना था,
अनगिनत दरियाओं के पुंज से
कश्ती लिए निकल पड़ा इस जल-जाल में
पर यहाँ तो बर्बादी की लहरें उफान पर थी
कश्ती कहाँ टिक पाती इस तुफान में
सोचकर सोचता ही रह गया
जब सब अजनबी हो ही गये तो
ये कश्ती क्यों अपनी होने को आई है
पलभर में ही ऐहसास हुआ
कश्ती तो बस एक जरिया है
असली मकसद तो मुझे इस सागर में डुबो देने का था
अपना-सा परायापन लिए
कश्ती ही बर्बाद कर गई मुझे
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