Monday, 28 May 2018

पहली गज़ल


पहली बार गज़ल लिखी है और मेरे लिए शायद ही इससे ज्यादा खुशी की बात और कोई हो सकेगी ।
आप इसे पढ़े और सुझाव लिखे

हसीन  थी मुलाकातें प्यार की
तमाम  जुङी यादें  दीदार  की

यूं  ही  नहीं  बनी   थी  तस्वीर
तलब  थी  सीने में इकरार की

आज भी  आ जाती है सामने
दफ्ऩ  तकलीफ़ें  तकरार  की

हर रोज़ याद दिलाती  है  रातें
वक़्त  दर  वक़्त  इंतज़ार  की

हकीक़त से वाकिफ 'नवाज़िश'
भूला  चुका  है  बातें  प्यार की


  - सुनिल जांगिङ ' नवाज़िश '

Tuesday, 1 May 2018

मैं देखता हूँ...

आज के दौर में इंसान की व्यस्तता ने इंसान को लाश बना दिया है । हो सकता है कि मेरी इस बात पर आप को क्रोध आ जाये और आप मेरा अहित करने के उद्देश्य से अपना स्मार्टफोन तोङ दे, परंतु आपको यह सब करने की आवश्यकता नहीं है। आप बस मेरी रचना को पढ़े और शांत रहे क्योंकि यह सब मैंने अपने नित्य अनुभवों के अनुरूप लिखा है। आशा है कि आपको अच्छी लगेगी....
देखता हूँ मैं,
उम्मीदों की चिता जलाते हुए
प्रतिशोध की ज्वाला सुलगते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
ख्वाबों को दम तोड़ते हुए
साँसें होने पर भी मरते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
लोगों को छद्म दंभ भरते हुए
ईर्ष्या की अग्नि में जलते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
जज्बात के अंगारें भङकते हुए
हताशा की बारिश में बुझे हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मै जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
आशिकी  के गम में खोते हुए
पल-पल खुशी के लिए रोते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

- सुनिल जांगिङ ' नवाजिश '

संघर्ष से सीखा है मैंने

संघर्ष से सीखा  है मैंने                                 (१) संघर्ष से सीखा है मैंने,                                तिनके ...