Tuesday, 1 May 2018

मैं देखता हूँ...

आज के दौर में इंसान की व्यस्तता ने इंसान को लाश बना दिया है । हो सकता है कि मेरी इस बात पर आप को क्रोध आ जाये और आप मेरा अहित करने के उद्देश्य से अपना स्मार्टफोन तोङ दे, परंतु आपको यह सब करने की आवश्यकता नहीं है। आप बस मेरी रचना को पढ़े और शांत रहे क्योंकि यह सब मैंने अपने नित्य अनुभवों के अनुरूप लिखा है। आशा है कि आपको अच्छी लगेगी....
देखता हूँ मैं,
उम्मीदों की चिता जलाते हुए
प्रतिशोध की ज्वाला सुलगते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
ख्वाबों को दम तोड़ते हुए
साँसें होने पर भी मरते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
लोगों को छद्म दंभ भरते हुए
ईर्ष्या की अग्नि में जलते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
जज्बात के अंगारें भङकते हुए
हताशा की बारिश में बुझे हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मै जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
आशिकी  के गम में खोते हुए
पल-पल खुशी के लिए रोते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

- सुनिल जांगिङ ' नवाजिश '

No comments:

Post a Comment

संघर्ष से सीखा है मैंने

संघर्ष से सीखा  है मैंने                                 (१) संघर्ष से सीखा है मैंने,                                तिनके ...