Saturday, 31 March 2018

हाँ मैं घर से दूर हूँ

आज के इस व्यस्त जीवन में प्रत्येक व्यक्ति कहीं ना कहीं अपने अपने घरों से दूर है, कोई शिक्षा ग्रहण करने के लिए बाहर है तो कोई धन कमाने के लिए अपने माता-पिता, भाई-बहन व दादा-दादी से दूर हैं। उनकी इस परिस्थिति पर मुझे कहीं से छोटा-सा विचार मिला है जिसे मैंने पंक्तिबद्ध किया है। आशा है ये आपको हृदय को छू लेगा---

हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर माँ तुमसे दूर नहीं
कहते हैं लोग मुझे मजबूर
पर मैं मजबूर नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर पापा आपसे दूर नहीं
लगे हैं लोग मुझे गिराने में
पर मैं कमजोर नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर भैया तुमसे दूर नहीं
भटका रहे मुझे सब पथ से
पर मैं डरा नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर दीदी तुमसे दूर नहीं
दिखा रहे हैं मुझे झूठा स्नेह
पर मैं तुझे भूला नहीं

Friday, 30 March 2018

राजस्थान दिवस

राजस्थान दिवस री बधाई ।
राजस्थान कैसा है ये आप जान सकते हो अपने घर परिवार के बुजुर्गों से या इतिहास के महान लेखकों द्वारा जिन्होंने भले ही अपना पराक्रम युद्ध के मैदानों में न दिखाया हो परंतु अपने कलम से या अपने अनुभवों को आप तक अवश्य ही पहुँचाया है। मैंने अपनी कलम से चंद पंक्तियों में राजस्थानी गौरव को समेटने का असंभव प्रयत्न किया है

रेतीळा धोरा सुं सजी है म्हारी या धरती
मीराबाईसा री भक्ति,
तो पन्नाधाय रो बळिदाण है अठै
राणीसा पद्मिनी रो जौहर
तो राणा रो पराकरम बस्योङो है अठै
विजय स्तंभ रो शीश ,
तो घणाई शीश कट्योङा है अठै
राजपूता री शान बसी,
तो गोरा रा धङ रो जोर है अठै
पुष्कर ज्याङो तीरथ है ईका काळजा माय
कदेई तो आवो म्हारे ई राजस्थान रे माय
 " पधारो म्हारे देस "


Wednesday, 28 March 2018

पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

गाँव कितना सुंदर होता है, कभी-कभी लगता है, नहीं कभी-कभी क्यों सदा यही लगता है कि मैं खुशनसीब हूँ जो ग्रामीण परिवेश से हूँ ।
परंतु पता नहीं क्या हो गया है आजकल मेरे गाँव को, बदल सा गया है ।  गाँव क्या हो गया है आजकल, क्या परिवेश था वो आय-हाय, वो प्यारा सा मौसम और और...अब खुद ही पढ़ लीजिये ना ।
पढ़ तो रहे हो पर बताईयेगा जरूर कैसा लगा। अगर अच्छा लगे तो ठीक और ना लगे अच्छा तो वापस पढ़ लेना कौनसा मैं डिलीट ही कर रहा हूँ....

पक्षियों की चहचहाहट,
वो पीपल के पत्तों की सरसराहट
कहीं खो गई लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

वो उषाकाल की शांति,
वो चंचल चेहरों की कांति
कहीं चली गई लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

दादी का वो दुलार,
वो पङोसी का वो तकरार
कहीं बीत गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

दोस्तों से गप्पे लङाना,
वो नीम के नीचे सुस्ताना
कहीं छूट गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

बेर तोङने चले जाना,
वो तालाब में साथ नहाना
कहीं चला गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

दीवाली में सबका साथ होना,
वो गोवर्धन पर चरण छूना
कहीं भूला दिया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

गाय को पानी पिलाना,
वो बछड़े संग खेलना
कहीं मिट गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

खुले आसमान में सोना,
वो कपङे की गेंद से खेलना
कहीं छिन गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है
                    .....नहीं लगता है

Tuesday, 27 March 2018

रूंखङा रो महत्व

अमृता बाई का बलिदान इतिहास के महान बलिदानों की किताब का ही एक पन्ना है। इस पन्ने का यह अध्याय इस महान देवी के शौर्य और पराक्रम की गाथा बताता है। मैंने अपनी मातृ भाषा राजस्थानी में चार पंक्तियाँ इस देवी को श्रृद्धांजलि के रूप में भेंट की है---


अमृता बाई रा बळिदाण ने आपा कियां भूलगा
दिन-रात बेचारा रूंखङा ने ईयां ही काटबा लागा
अगर थे थाकी धरती माता सू घणो लाङ करो
तो रूंखङो लगाओ जर ही लागी सरग माई आगा

Monday, 26 March 2018

आखिर क्यों हूँ मैं

हमने देखा है कि मनुष्य इस धरती पर जन्म लेते ही इस सोच में पड़ जाता है की हमें भगवान ने किसलिए भेजा है क्योंकि बिना किसी उद्देश्य के तो कुछ भी घटित नहीं होता है।  इसलिए मैंने इसे अपने ऊपर लेते हुए ही ये कुछ पंक्तियाँ लिखी है उम्मीद है आप लोगों को ये जरूर पसन्द आयेगी।  आशा करता हूँ की आप मेरे इस प्रयास को सराहेंगे
तो पेश है---


आखिर क्यों हूँ मैं
अब तक उम्मीद की तलाश में हूँ या
उम्मीदों के पूर्ण न होने के दुख में हूँ

आखिर क्यों हूँ मैं
ख्वाब को हकीकत बनाने में हूँ याख्वाबों से निकलने के प्रयास में हूँ

आखिर क्यों हूँ मैं
कामयाबी के नये पथ की ओर हूँ यानाकामयाबी की वजह ढूँढ रहा हूँ

आखिर क्यों हूँ मैं
जहाँ को कुछ देने की आस में हूँ याइस जहाँ में यूं ही खो जाने में हूँ

आखिर क्यों हूँ मैं
प्यार के जाल में फँस जाने में हूँ या
प्यार से जग को जीत जाने की जद में हूँ

आखिर क्यों हूँ मैं
अपने हाथों को सख्त बनाने के लिए हूं याकिसी के समक्ष हाथ फैलाने के लिए हूँ
आखिर क्यों हूँ मैं
पिता का सहारा बनने इस जहाँ में हूँ याजहाँ-तहाँ उन्हें बेसहारा छोङने में हूँ

आखिर क्यों हूँ मैं.........

Sunday, 25 March 2018

रामनवमी विशेष

आज के दौर में अत्याचार की तो हद ही हो गयी है ऐसे में हर एक व्यक्ति उलझन में है कि कही न कही कोई उम्मीद की किरण नज़र आ जाये और वो इस पीड़ामय संसार से निकल जाये। आज के रामनवमी के अवसर पर मेरा एक मुक्तक प्रभु श्री राम के नाम
जय श्री राम


फिर से त्रेता का काल आ जाए
वो पुरूषोत्तम पुनः दर्शन दे जाए
अन्याय के दंश का नाश करने वाले,
काश कलियुग में भी वे राम आ जाए


Saturday, 24 March 2018

घर : एक लघु कथा

घर सबको प्यारा होता है और एक व्यक्ति के लिए शायद ही घर से  महत्वपूर्ण कोई और चीज़ होती है।  मेरी कहानी भी कुछ इस कदर ही है मुझे भी अपने घर से ज्यादा प्यारा और कुछ नहीं।  मेरा घर मेरे जन्म से भी पहले से कही सारी परेशनियों  से गुज़र चुका है और ये जो कविता है वो मेरे जीवन की वास्तविक घटना पर आधारित है।

मैंने देखी है कई तकलीफें
पर घर ने तो असीम दर्द का मंजर देखा है

 मैंने देखा है घर को बनते हुए
पर घर ने तो परिवार बनते देखा है

मैंने देखा है नयी पीढ़ियों को उगते हुए
पर घर ने तो इन्हें वृक्ष बनते देखा है

मैंने देखा है पूराने घर को टूटते हुए
पर घर ने तो रिश्तों को टूटते देखा है

मैंने देखा है पिता को जूझते हुए
पर घर ने तो पूरे वंश को दर्द में देखा है

मैंने देखा है रिश्तों को छल करते हुए
पर घर ने तो पूरे कुटुंब का दंश देखा है

मैंने देखा है दर्द का महज एक पन्ना
पर घर ने तो दर्द की पुस्तक लिखते देखा है

मैंने देखा है उम्मीद को मरते हुए
पर घर ने तो इसे श्मशान में जलते देखा है

मैंने देखा है ख्वाबों को बनते हुए
पर घर ने तो ख्वाबों को सच होते देखा है

मैंने देखा है अंततः पिता को खुश होते हुए
पर घर ने तो पूर्वजों को इस पल के लिए रोते देखा है

Friday, 23 March 2018

मेरी दास्तां-1

मेरी जिंदगी ने कही बार धर्मसंकट में डाला है और मैं  कई  बार इससे निकलने में कामयाब रहा हूँ परन्तु कई  मर्तबा जिंदगी मुझे ही दगा दे गयी।  मैं  आज भी इसी तरह की परिस्थिति  में फंसा हुआ हूँ जहाँ मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि मैं  क्या करूँ इसलिए मैंने अपनी सच्ची घटना को पक्तिबद्ध किया है और आशा है आपको ये जरूर पसंद आयेगी---



जिंदगी ने मुझे दो राहें दिखाई
पर चुनने की कला ना सिखाई
हसीं ख्वाबों के साथ एक पर चल पड़ा
सोचकर कि यार सोचने में क्या गङा
पर मैनें यह क्यों नहीं सोचा ?
रास्तें चुनने में भी होता है लोचा
अनजान पथ पर नयी उम्मीद से बढ़ा
हसीन ख्वाबों को साथ लेकर चढ़ा
जाने क्यों सबने इसे मूर्खता बताया
हँसकर मुझपर मुझे ही सबकुछ सुनाया
जो भी हुआ अब करता ही क्या मैं
मेरा ही किया था सो अब सहता ही मैं
भैया बोले मत कर विचार इसपर
चलता रह अब यूं ही इस पथ पर
क्यों करता है तू चिंता सफलता की
खुश रह जरूरत है तेरी चपलता की
फिर रब़ ने मुझे एक उम्मीद से मिलाया
तब मैनें इसी पथ पर ही रहना तय किया
वक्त यूं ही बढ़ता गया
मैं उम्मीदें खोता गया
गुजरते वक्त ने उम्मीदों को क्षीण कर दिया
मैं पहले जहाँ था वही लाकर खड़ा कर दिया
वक्त ने फिर से उम्मीदों की किताब खोल दी
नाउम्मीदों की बातें मेरे मुँह पर ही बोल दी
किस्मत ने हराने की तमाम कोशिशें की
टूट जाऊ, हार जाऊ मैं ऐसी उम्मीदें की
उम्मीदें नहीं थी तो केवल उम्मीदों से
तन भी साथ नहीं देता तो जीते भी कैसै?
कहते है ना वक्त सदा बुरा नहीं रहता है
कहीं न कहीं एक दिया तो जलता ही रहता है
जीवन में फिर से एक मोङ आया.......

(जारी रहेगी 'मेरी दास्तां' भाग-2 में )











Thursday, 22 March 2018

ये लहरे

आज मैं आनासागर के तट पर बैठा था और शीतल हवाओं और लहरों को महसूस कर रहा था तभी कुछ लिखने का मन किया और मैंने ये लिख दिया शायद ये कुछ मेरे से ज्यादा ही जुडी है इसलिए......

सोचा था इन लहरों में कही खो जाऊ
डूब जाऊ इन हसीं लम्हों में
तभी एक विचार कौंधा
क्यों खो जाऊ इन लहरों में ?
क्यों डूब जाऊ लम्हों में ?
न ये लम्हें अपने हैं
और ना ही ये लहरें...

Tuesday, 20 March 2018

अधूरा सा

 दिल के जज़्बात क्या होते हैं कभी सोचा है, शायद मैं भी यही सोच रहा हूँ। तभी बेवजह की ये पंक्तियाँ लिख रहा हूँ, अब करु भी तो क्या इस दिल का लिखता तो हूँ पर पता नहीं क्यों सब कुछ अजीब सा लगता है। पर जो भी हो लिखकर दिल को जरूर सुकून मिल जाता है
पेश है कुछ अलग-----

मेरे दिल के अधूरे जज्बात
और इन जज्बातों की अधूरी सी कहानी हो तुम
कैसे बयां करूं इसको

"क्योंकि कलम भी काल्पनिक है और कागज भी"

Sunday, 18 March 2018

नाराज जिदंगी

जिंदगी क्या है और क्यों हमें इससे उम्मीदें रखनी चाहिए। अब अपनी कहानी क्या बताऊ आपको मैं खुद भी किसी से उम्मीद लगा बैठा था और उम्मीद उम्मीद होती है सो टूट गयी। जब उम्मीद टूटी तब मुझे अपने बड़े भैया की एक बात याद आयी, उन्ही के शब्दों में " सोनू ! कभी किसी से भी उम्मीद मत लगाना, उम्मीद टूटते देर नहीं लगती" खैर जो हुआ सो हुआ। अब आप इन पंक्तियों को तनिक हृदय से समझे, फिर से उम्मीद लगाता हूँ  पसंद जरूर आयेगी------

जिदंगी मुझ नाचीज से तो पहले ही खफा थी
और फिर मुझसे कहने लगी
"तेरी उम्मीदों की मंजिल कहाँ है"
पर मैं तो खफा न था जिदंगी से
कह दिया मैंने भी
"वो कच्ची उम्मीदों के पत्थर थे
इसलिए मंजिल ही ढह गई "

नववर्ष

नववर्ष के नूतन दिवस का कुछ यूं अभिनंदन करें
कि कुछ नया सा प्रयास हो
पिछला ही क्यों कुछ आगे का भी चिंतन करें
गलत जो था पहले अब क्यों न वो ही सही हो

Saturday, 17 March 2018

तेरा इस कदर...

तेरा इस कदर यूं मुस्कुरा देना
जैसे
मेरे उजङे दिल को हरा-भरा कर देना
तेरा इस कदर यूं बयां करना
जैसे
बिना कुछ कहे सब कुछ कह देना
तेरा इस कदर यूं चल देना
जैसे
मेरे मन के गाँव को उजाङ कर जाना

Friday, 16 March 2018

गुरूर

बहुत सोचा कि वो अपने हो जाएंगे 
मिलकर हमसे वो एक हो जाएंगे 
बहुत गुरूर था खुद पर मगर सोचा न था 
कि वो खुद एक दिन किसी के अपने हो जाएंगे 

Thursday, 15 March 2018

नज़राना

तुम हमें नज़र आए 
बस उसे ही हमने नज़राना समझ लिया . . . 

Friday, 9 March 2018

चलो एक नया दौर लिखते हैं

चलो एक नया दौर लिखते हैं
नव-काल की नव-गाथाओं को
कुछ तुम लिखो कुछ हम लिखते हैं

चलो एक नया दौर लिखते हैं
अंधविश्वास की इन पट्टियों को
कुछ तुम खोलो कुछ हम खोलते हैं

चलो एक नया दौर लिखते हैं
नये दौर की इस मशाल को
कुछ तुम जलाओ कुछ हम जलाते हैं

चलो एक नया दौर लिखते हैं
कुरितियों की अमिट छाप को
कुछ तुम मिटाओ कुछ हम मिटाते हैं

चलो एक नया दौर लिखते हैं

Thursday, 8 March 2018

क्योंकि वो एक औरत कहलाती है

क्योंकि वो एक औरत कहलाती है

अपने सुत का बलिदान करके
वो पन्ना धाय बन जाती है

क्योंकि वो एक औरत कहलाती है

देश प्रेम में प्रज्वलित होकर
वो लक्ष्मीबाई बन जाती है

क्योंकि वो एक औरत कहलाती है.....continue 

Monday, 5 March 2018

तुम्हें शिव बनना ही होगा

तुम्हें शिव बनना ही होगा

संघर्ष के इस विष प्याले को
एक घूंट में पीना ही होगा

तुम्हें शिव बनना ही होगा

शालीनता की इस गंगा को
जटा में धारण करना ही होगा

तुम्हें शिव बनना ही होगा

पराजय की इस भस्म को
तन पर अपने मलना ही होगा

तुम्हें शिव बनना ही होगा........continue



Sunday, 4 March 2018

फिर से एक आँधी लानी है



फिर से एक आँधी लानी है

ख्वाबों की महफिल सजानी है
बुझ गये परवानों में
एक शमा की लौ जलानी है

फिर से एक आँधी लानी है

मन में एक आस जगानी है
जंग लगी इन तलवारों में
एक नयी धार लगानी है

फिर से एक आँधी लानी है

दीप नहीं मशाल जलानी है
मन के इस द्वंद्वदल में
निर्णय  की तोप चलानी है

फिर से एक आँधी लानी है

संघर्ष से सीखा है मैंने

संघर्ष से सीखा  है मैंने                                 (१) संघर्ष से सीखा है मैंने,                                तिनके ...