आज के इस व्यस्त जीवन में प्रत्येक व्यक्ति कहीं ना कहीं अपने अपने घरों से दूर है, कोई शिक्षा ग्रहण करने के लिए बाहर है तो कोई धन कमाने के लिए अपने माता-पिता, भाई-बहन व दादा-दादी से दूर हैं। उनकी इस परिस्थिति पर मुझे कहीं से छोटा-सा विचार मिला है जिसे मैंने पंक्तिबद्ध किया है। आशा है ये आपको हृदय को छू लेगा---
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर माँ तुमसे दूर नहीं
कहते हैं लोग मुझे मजबूर
पर मैं मजबूर नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर पापा आपसे दूर नहीं
लगे हैं लोग मुझे गिराने में
पर मैं कमजोर नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर भैया तुमसे दूर नहीं
भटका रहे मुझे सब पथ से
पर मैं डरा नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर दीदी तुमसे दूर नहीं
दिखा रहे हैं मुझे झूठा स्नेह
पर मैं तुझे भूला नहीं

