Wednesday, 22 August 2018

संघर्ष से सीखा है मैंने


संघर्ष से सीखा  है मैंने 




                               (१) संघर्ष से सीखा है मैंने,
                               तिनके से नाव को पार कर जाना
                               भूत की छांव को भुलाकर,
                               वर्तमान को स्वीकार कर जाना

                                                                                (२) संघर्ष से सीखा है मैंने,
                                                                                कर्त्तव्यनिष्ठा की डोर बन जाना
                                                                                आदर्श के मोतियों को पिरोकर,
                                                                                गांठ बनकर, एक छोर बन जाना

                               (३) संघर्ष से सीखा है मैंने,
                               अपूर्ण स्वप्नों को फिर जीवित करना
                               मेहनत के पसीने से सींचकर,
                               पौधे को वृक्ष में परिवर्तित करना

                                                                                (४) संघर्ष से सीखा है मैंने,
                                                                                मरकर भी अमर्त्य हो जाना
                                                                                स्व-ज्वाला में तपकर,
                                                                                प्रकाशमयी आदित्य हो जाना

                              (५) संघर्ष से सीखा है मैंने,
                              साहस से हालात से लङ जाना
                              हौसले की शमशीर लेकर,
                              अभागे भाग्य से भिङ जाना

                                                                                          
                                                                                      -  सुनिल  जांगिड़ 



Sunday, 17 June 2018

गज़ल



जुबां   थी   मिरी  तू   तक़रीर  तो  बन
जिंदगी  न  बनी अब  तस्वीर  तो  बन

गुलशन-ए-बहार  न   बन  सकी  मिरी
आशिकी न  कर मिरा ज़मीर  तो  बन

खामोश  नज़्म   थी  तू   महफ़िल  की
मिरे लफ्ज़ों  के लिए  तहरीर  तो  बन

मिरी हालत पे  तरस तो सही जालिम
बदकिस्मत हूँ  मैं  आ तकदीर तो बन

जला है मिरा ज़िस्म  मर्ज़-ए-इश्क़ से
दवा न बन  सकी तू   तासीर  तो  बन

'नवाज़िश' हो मुकम्मल कर इश्क़ को
इश्क़  पर   हक  जता  हमीर  तो  बन


                                                                     -सुनिल जांगिङ ' नवाज़िश '

Monday, 28 May 2018

पहली गज़ल


पहली बार गज़ल लिखी है और मेरे लिए शायद ही इससे ज्यादा खुशी की बात और कोई हो सकेगी ।
आप इसे पढ़े और सुझाव लिखे

हसीन  थी मुलाकातें प्यार की
तमाम  जुङी यादें  दीदार  की

यूं  ही  नहीं  बनी   थी  तस्वीर
तलब  थी  सीने में इकरार की

आज भी  आ जाती है सामने
दफ्ऩ  तकलीफ़ें  तकरार  की

हर रोज़ याद दिलाती  है  रातें
वक़्त  दर  वक़्त  इंतज़ार  की

हकीक़त से वाकिफ 'नवाज़िश'
भूला  चुका  है  बातें  प्यार की


  - सुनिल जांगिङ ' नवाज़िश '

Tuesday, 1 May 2018

मैं देखता हूँ...

आज के दौर में इंसान की व्यस्तता ने इंसान को लाश बना दिया है । हो सकता है कि मेरी इस बात पर आप को क्रोध आ जाये और आप मेरा अहित करने के उद्देश्य से अपना स्मार्टफोन तोङ दे, परंतु आपको यह सब करने की आवश्यकता नहीं है। आप बस मेरी रचना को पढ़े और शांत रहे क्योंकि यह सब मैंने अपने नित्य अनुभवों के अनुरूप लिखा है। आशा है कि आपको अच्छी लगेगी....
देखता हूँ मैं,
उम्मीदों की चिता जलाते हुए
प्रतिशोध की ज्वाला सुलगते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
ख्वाबों को दम तोड़ते हुए
साँसें होने पर भी मरते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
लोगों को छद्म दंभ भरते हुए
ईर्ष्या की अग्नि में जलते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
जज्बात के अंगारें भङकते हुए
हताशा की बारिश में बुझे हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मै जिंदा लाशें जो देखता हूँ

देखता हूँ मैं,
आशिकी  के गम में खोते हुए
पल-पल खुशी के लिए रोते हुए
हर रोज़ देखता हूँ...
मैं जिंदा लाशें जो देखता हूँ

- सुनिल जांगिङ ' नवाजिश '

Wednesday, 4 April 2018

अजनबी कश्ती और मैं

हमारा जीवन रिश्तों से भरा पड़ा है रिश्तें हर प्रकार से हमें प्रभावित करते हैं। कुछ लोग तो रिश्तों की मर्यादा ही भूल जाते हैं तब हमें लगने लगता हैं कि एक अजीब सा अनजानापन आ गया है हमारे जीवन में।
कुछ इन्हीं शब्दों को मैनें एक अलग लहजें में कहने का प्रयास किया है---

मैं चलता रहा, यूं ही चलता रहा
राहें अजनबी सी होती गई 
कब राहें मुझसे अनजान हुई, मालूम नहीं 
जब पता चला तब पता हुआ 
कि राहें ही क्या, राहगीर भी हमसे अजनबी हो गए हैं
जिन्हें कभी मैं राहें बतलाता था
आज मैं खुद राहों के राज उनसे मालूम करता हूँ 
कितना अजीब है ना अनजान हो जाना
ज्यादा अजीब तो है अपनों से अनजान होना
सोचता हूँ वक्त का दरिया तो बह ही गया है
क्यों न सीधा सागर में ही चलूं 
सागर में झाँका तो सहम ही गया
दफ्न थी अपनों से नादानी, 
बर्बाद वक्त की लहरें उठ रही थी
वक्त तो गुजार ही दिया था,
वक्त निकालने के लिए 
तैरना नहीं सीखा, 
तभी डूब ही गये दरिया में तो
अब तो सामना था, 
अनगिनत दरियाओं के पुंज से
कश्ती लिए निकल पड़ा इस जल-जाल में
पर यहाँ तो बर्बादी की लहरें उफान पर थी
कश्ती कहाँ टिक पाती इस तुफान में
सोचकर सोचता ही रह गया
जब सब अजनबी हो ही गये तो
ये कश्ती क्यों अपनी होने को आई है
पलभर में ही ऐहसास हुआ
कश्ती तो बस एक जरिया है
असली मकसद तो मुझे इस सागर में डुबो देने का था
अपना-सा परायापन लिए 
कश्ती ही बर्बाद कर गई मुझे 

Saturday, 31 March 2018

हाँ मैं घर से दूर हूँ

आज के इस व्यस्त जीवन में प्रत्येक व्यक्ति कहीं ना कहीं अपने अपने घरों से दूर है, कोई शिक्षा ग्रहण करने के लिए बाहर है तो कोई धन कमाने के लिए अपने माता-पिता, भाई-बहन व दादा-दादी से दूर हैं। उनकी इस परिस्थिति पर मुझे कहीं से छोटा-सा विचार मिला है जिसे मैंने पंक्तिबद्ध किया है। आशा है ये आपको हृदय को छू लेगा---

हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर माँ तुमसे दूर नहीं
कहते हैं लोग मुझे मजबूर
पर मैं मजबूर नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर पापा आपसे दूर नहीं
लगे हैं लोग मुझे गिराने में
पर मैं कमजोर नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर भैया तुमसे दूर नहीं
भटका रहे मुझे सब पथ से
पर मैं डरा नहीं
हाँ मैं घर से दूर हूँ
पर दीदी तुमसे दूर नहीं
दिखा रहे हैं मुझे झूठा स्नेह
पर मैं तुझे भूला नहीं

Friday, 30 March 2018

राजस्थान दिवस

राजस्थान दिवस री बधाई ।
राजस्थान कैसा है ये आप जान सकते हो अपने घर परिवार के बुजुर्गों से या इतिहास के महान लेखकों द्वारा जिन्होंने भले ही अपना पराक्रम युद्ध के मैदानों में न दिखाया हो परंतु अपने कलम से या अपने अनुभवों को आप तक अवश्य ही पहुँचाया है। मैंने अपनी कलम से चंद पंक्तियों में राजस्थानी गौरव को समेटने का असंभव प्रयत्न किया है

रेतीळा धोरा सुं सजी है म्हारी या धरती
मीराबाईसा री भक्ति,
तो पन्नाधाय रो बळिदाण है अठै
राणीसा पद्मिनी रो जौहर
तो राणा रो पराकरम बस्योङो है अठै
विजय स्तंभ रो शीश ,
तो घणाई शीश कट्योङा है अठै
राजपूता री शान बसी,
तो गोरा रा धङ रो जोर है अठै
पुष्कर ज्याङो तीरथ है ईका काळजा माय
कदेई तो आवो म्हारे ई राजस्थान रे माय
 " पधारो म्हारे देस "


संघर्ष से सीखा है मैंने

संघर्ष से सीखा  है मैंने                                 (१) संघर्ष से सीखा है मैंने,                                तिनके ...