जुबां थी मिरी तू तक़रीर तो बन
जिंदगी न बनी अब तस्वीर तो बन
गुलशन-ए-बहार न बन सकी मिरी
आशिकी न कर मिरा ज़मीर तो बन
खामोश नज़्म थी तू महफ़िल की
मिरे लफ्ज़ों के लिए तहरीर तो बन
मिरी हालत पे तरस तो सही जालिम
बदकिस्मत हूँ मैं आ तकदीर तो बन
जला है मिरा ज़िस्म मर्ज़-ए-इश्क़ से
दवा न बन सकी तू तासीर तो बन
'नवाज़िश' हो मुकम्मल कर इश्क़ को
इश्क़ पर हक जता हमीर तो बन
-सुनिल जांगिङ ' नवाज़िश '
No comments:
Post a Comment