Sunday, 17 June 2018

गज़ल



जुबां   थी   मिरी  तू   तक़रीर  तो  बन
जिंदगी  न  बनी अब  तस्वीर  तो  बन

गुलशन-ए-बहार  न   बन  सकी  मिरी
आशिकी न  कर मिरा ज़मीर  तो  बन

खामोश  नज़्म   थी  तू   महफ़िल  की
मिरे लफ्ज़ों  के लिए  तहरीर  तो  बन

मिरी हालत पे  तरस तो सही जालिम
बदकिस्मत हूँ  मैं  आ तकदीर तो बन

जला है मिरा ज़िस्म  मर्ज़-ए-इश्क़ से
दवा न बन  सकी तू   तासीर  तो  बन

'नवाज़िश' हो मुकम्मल कर इश्क़ को
इश्क़  पर   हक  जता  हमीर  तो  बन


                                                                     -सुनिल जांगिङ ' नवाज़िश '

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