Wednesday, 28 March 2018

पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

गाँव कितना सुंदर होता है, कभी-कभी लगता है, नहीं कभी-कभी क्यों सदा यही लगता है कि मैं खुशनसीब हूँ जो ग्रामीण परिवेश से हूँ ।
परंतु पता नहीं क्या हो गया है आजकल मेरे गाँव को, बदल सा गया है ।  गाँव क्या हो गया है आजकल, क्या परिवेश था वो आय-हाय, वो प्यारा सा मौसम और और...अब खुद ही पढ़ लीजिये ना ।
पढ़ तो रहे हो पर बताईयेगा जरूर कैसा लगा। अगर अच्छा लगे तो ठीक और ना लगे अच्छा तो वापस पढ़ लेना कौनसा मैं डिलीट ही कर रहा हूँ....

पक्षियों की चहचहाहट,
वो पीपल के पत्तों की सरसराहट
कहीं खो गई लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

वो उषाकाल की शांति,
वो चंचल चेहरों की कांति
कहीं चली गई लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

दादी का वो दुलार,
वो पङोसी का वो तकरार
कहीं बीत गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

दोस्तों से गप्पे लङाना,
वो नीम के नीचे सुस्ताना
कहीं छूट गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

बेर तोङने चले जाना,
वो तालाब में साथ नहाना
कहीं चला गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

दीवाली में सबका साथ होना,
वो गोवर्धन पर चरण छूना
कहीं भूला दिया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

गाय को पानी पिलाना,
वो बछड़े संग खेलना
कहीं मिट गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है

खुले आसमान में सोना,
वो कपङे की गेंद से खेलना
कहीं छिन गया लगता है
पर ये तो मेरा गाँव नहीं लगता है
                    .....नहीं लगता है

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